आरक्षित सीटें होने के बावजूद बसों में परेशानी भरा सफर
बसों में जीएम की सख्ती के बावजूद छात्राओं, महिलाओं को खड़े रहना पड़ता है
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उपमंडल में सिरसा जिले सहित डबवाली सब डिपो की कुल 200 से अधिक रोडवेज इतनी ही निजी बसें चलती हैं। जिसमें रोजाना पुरुषों के मुकाबले 25 प्रतिशत महिला यात्री सफर करती हैं। सरकार ने इस माह से रोडवेज में महिला अारक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर 16 कर दी है। लेकिन इस अधिकार के बावजूद महिलाओं को सीट नहीं मिल रही। हालांकि सभी आरक्षित सीटें बस चालक के एकदम पीछे और अगली खिड़की के पास होती हैं। जिस कारण चालक परिचालक आसानी से महिलाअों को सीटें उपलब्ध करा सकते हैं लेेकिन ऐसा नहीं हो रहा। बसों में चालक के पीछे की महिला आरक्षित सीटों पर पुरुष यात्री बैठे रहते हैं जबकि महिला यात्रियों को खड़ा होना पड़ता है। प्रदेश सरकार की अोर से छात्राओं को निशुल्क यात्रा की सुविधा दी गई है। अधिकतर छात्राओं को रोडवेज से पास जारी नहीं कराया जाता। निरीक्षण के दौरान करेंगे गौर सब डिपो इंचार्ज हरमीत सिंह पक्का ने बताया कि रोडवेज नियम अनुसार महिलाएं, बुजुर्गों, विकलांगों, सैनिक, मरीजों के लिए सीटें आरक्षित हैं। उन सीटों पर नंबर के साथ आरक्षित श्रेणी का नाम भी लिखा है। चालक परिचालक को निर्देश भी दिए हैं ताकि आरक्षित श्रेणी वाला यात्री बिना सीट के रहे। आमतौर पर बस में सीटें दे देते हैं। निरीक्षण के दौरान इस पर गौर किया जाएगा। टिकट छूट के लिए छात्राओं को निशुल्क बस पास जारी किया जाता है जो बसों में जरूरी होता है। रोडवेज में ये सीटें होती हैं आरक्षित रोडवेज बस में 54 सीटें होती हैं। एक परिचालक सीट के अलावा 16 सीटेें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं। पिछली खिड़की के सामने वाली सीट पर दाे सीट अशक्त के सहयोगी के लिए, सैनिक के लिए एक सीट, एमएलए के लिए एक सीट, एमपी के लिए एक सीट, कैंसर मरीज के लिए एक सीट आरक्षित होती है। लेकिन जागरूकता के अभाव और बस चालक परिचालकों के गौर नहीं करने से आरक्षित सीटों का लाभ महिलाओं अन्य पात्रों को नहीं मिल पाता है। जिससे अशक्त यात्रियों उनके सहायकों को भी समस्या होती है। इसी प्रकार निजी बसों में भी छात्राओं महिला यात्रियों को सीट नहीं मिलने पर खड़े रहकर सफर करना पड़ता है। |
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