कैसे जीते हैं भला इनसे पूछो तो जरा... रोजी-रोटी का जुगाड़ करना भी दुश्वार
सरकार की कारगुजारियों के कारण ,शिक्षा से दूर होते बच्चे#dabwalinews.com
कहीं जल रहे टायरों से उठता काला धुंआ आसमान की ओर उड़ रहा है, कहीं प्लास्टिक जल रहा है, जहां-तहां से गलियां पूरी तरह से टूटी हैं तो वहीं हर तरफ लगे गंदगी के ढेरों के आस-पास चारपाईयों पर बैठी महिलाएं नन्हे-नन्हें बच्चों को पुचकार रही हैं तो कहीं स्कूल जाने की चाहत को मन में दबाए छोटे-छोटे बच्चे कचरे से दो जून की रोटी की तलाश में जुटे हैं। यह नजारा है वार्ड 18 के अंर्तगत आने वाले हर्ष नगर का। यहां आकर आम आदमी की सांसें थमी-थमी और जिंदगी रूकी-रूकी सी होने का अहसास करवाती है। मन के किसी कोने से यह गीत निकलता है ‘कैसे जीते हैं भला इनसे पूछो तो जरा....’
संवाददाता ने हर्ष नगर में जो देखा और सुना उसे हम पाठकों, सरकार व स्थानीय नेताओं तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे। पेट भरने के लिए किस दुर्दशा से और किन कठिन परिस्थितियों से ये लोग गुजरते हैं इनका विस्तार से उल्लेख करेंगे ही, तो वहीं सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और चिकित्सकों, बैंकों और अन्य विभागों के अधिकारियों द्वारा इन लोगों के साथ किए जाने व्यवहार के बारे में भी सभी तथ्यों के साथ प्रकाशित करेंगे ताकि सरकार व आमजन को पता चल सके कि दिन भर कूड़ा बीनकर उसमें से रोजी-रोटी तलाशने वाले इन असहाय परिवारों के साथ सरकार व विभागीय अधिकारियों का व्यवहार किस तरह का है और सरकारी हस्पताल के चिकित्सकों द्वारा प्रसव पीड़ा से गुजरने वाली महिलाओं को किस तरह प्रताडि़त किया जाता है इसका भी उल्लेख करेंगे और जिन ने इनके साथ दुर्रव्वहार किया उनका भी उल्लेख करेंगे। इसकी कितनी कडिय़ां बनेंगी यह अभी कह पाना संभव तो नहीं है लेकिन कड़ी-दर-कड़ी इसका उल्लेख कर उन चेहरों को बेनकाब किया जाएगा जिसे सुनकर आम आदमी का दिल दहल उठेगा।चलिए आज आपकों वार्ड 18 स्थित हर्ष नगर की ओर ले चलते हैं। यह वह नगर हैं जहां कि महिलाएं व बच्चे ठिठुरन भरे मौसम मे तडक़े चार बजे कंधे में बड़ा सा बोरीनुमा झोला लटका कर शहर की गलियों व बाजारों में पड़े पॉलीथीन प्लास्टिक व शहर के लोगों द्वारा अन्य तरह का बेकार सामान उठाकर आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। जब तक शहर के लोग नींद से जागते हैं तब तक तो ये महिलाएं और बच्चें शहर के लोगों द्वारा फैंकी गई अधिकतर गंदगी को तो ये लोग अपने झोले में डाल चुके होते हैं यानि नगर परिषद के सफाईे कर्मचारियों के सफाई कार्य में सहयोग कर चुके होते हैं।
सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि सरकार जिन सुविधाओं और योजनाओं का लाभ देने के बड़े-बड़े दावे करती है उनका लाभ इन्हें कभी नहीं मिला। बच्चे शिक्षा के उजियारे से उतनी ही दूर हैं जितना धरती से चांद। हर्ष नगर में लगभग 400 से अधिक परिवार वास करते हैं सभी लोग कूड़ा-कर्कट बीनने का ही कार्य करते हैं। निर्मला देवी, संतोष रानी, चमेली,पुष्पा, डिंपल, विजय अटवाल, शाहीद, अमित, सुमित आदि बताते हैं कि कुछ घरों के बच्चे श्री गुरू गोबिंद सिंह खेल परिसर में बने प्राइमरी स्कूल मे जाते हैं। कुछ जाते हैं तो कुछ नहीं जाते, कुछ कभी-कभी जाते हैं लेकिन यह पूछने वाला कोई नहीं कि आखिर प्रतिदिन बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते हैं। यह तो है शिक्षा का हाल। पंाचवी कक्षा से आगे की शिक्षा का कोई इंतजाम तक नहीं है। चलिए ये तो हैं यहां की शिक्षा की बात।
अब बात करते हैं इनके कारोबार की जिसके लिए यह सुबह से लेकर देर शाम तक बाजारों-गलियों की खाक छानते हैं। आपकों यह जानकर हैरानी होगी की आमजन के साथ-साथ नोटबंदी और जीएसटी का असर इनके काम पर भी पड़ा है। अब आप सोच रहे होंगे कि कूड़े पर कैसी नोटबंदी और कैसी जीएसटी लेकिन यह सच है। हर्ष नगर के निवासियों द्वारा शहर व आस-पास के इलाके से एकत्रित किया गया प्लास्टिक, पॉलिथीन, गत्ता आदि का भाव जीएसटी के कारण एकदम नीचे गिर गया है। यहां के निवासी बलजीत व शिवजी ने बताया कि जो प्लास्टिक व पॉलीथीन भाजपा सरकार द्वारा लगाए गए जीएसटी कर से पूर्व 300 रूपये किलो बिकता था लेकिन अब वहीं सब 70 से 80 रूपये किलो बिकता है। ऐसे में काम धंधां चौपट होकर रह गया है। अब पाठक स्वयं ही अनुमान लगा लें कि यह लोग किस तरह से अपना जीवन बसर कर रहे हैं तो वहीं इन्हें जगह-जगह अपमान के घूंट पीने को मजबूर होना पड़ता है सो अलग।
पढ़े लिखे युवक भी कचरा उठाने को मजबूर,सरकारी योजनाओं का नहीं मिला लाभ
हर्ष नगर के केवल तीन-चार युवकों को छोडक़र एक भी युवक पांचवी कक्षा से उपर शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाया। बाहरवी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाले डिंपल व विजय कुमार नामक युवक ने बताया कि कई माह तक ठोकरें खाने के बाद भी कोई रोजगार नहीं मिला। मां-बाप ने बड़ी मुश्किलों से फाके काटकर पढ़ाया था लेकिन अब सरकार द्वारा कोई रोजगार न उपलब्ध करवाए जाने के कारण वे फिर से कूड़ा बीनने के काम में जुट गए हैं। उन्होंने बताया कि उनका पुस्तैनी काम तो सिंगी लगाना था लेकिन समय के साथ-साथ यह काम भी अब बंद हो गया है। अब केवल कचरा बीनने के इलावा कोई और चारा ही नहीं बचा है।
मुश्किल से होता है परिवार का गुजार
सुनीता, पुष्पा, रानी, पिहू, सोनम आदि का कहना है कि सुबह से लेकर शाम तक कूड़ा बीनने के बाद बोझ उठाकर और पैदल लंबा सफर करने के बाद हर्ष नगर पहुंचते हैं। प्लास्टिक आदि जो कुछ भी एकत्र करके लाते हैं उसका पूरा भाव नहीं मिलता। इससे पहले एक दिन में तीन से चार सौ रूपये कमा लेत थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि बच्चों के साथ मिलकर दिनभर खाक छानने के बाद 100 से 150 रूपये तक ही बन पाते हैं, जिससे घर का गुजारा नहीं होता। उक्त महिलाओं ने बताया कि ऐसे में घर में कोई बीमार पड़ जाए तो सरकारी हस्पताल में उन्हें इलाज नहीं मिलता और उधारी लेकर निजी चिकित्सक से इलाज करवाने को मजबूर होना पड़ता है। उनका कहना है कि ऐसे में जीवन गुजारना दुश्वार हो गया है।
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