बहरुपिये की कला को जीवंत करते हैं डबवाली के मशहूर जोकर
'जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां" शो-मैन राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म मेरा नाम जोकर के इस गीत की पंक्तियां ऐसे किसी किरदार को देखकर स्वत: ही जहन में आ जाती हैं। लेकिन ऐसा रुप धारण करने वाले बहरुपियों की जिंदगी की कड़वी सच्चाई कुछ ओर ही ब्यां करती है। कभी जोकर तो कभी कोई और स्वांग रचाकर अपने परिवार का पेट पाल रहे चौटाला रोड स्थित वार्ड नंबर 6 के सुंदर नगर निवासी खरैती लाल पुत्र वेद प्रकाश भले ही लोगों को हंसाकर उनके जीवन में खुशियों के रंग घोल रहे हों, लेकिन असली जिंदगी के संघर्ष की कहानी कुछ ओर ही है। डबवाली के मशहूर जोकर के नाम से मशहूर हुआ खरैती लाल परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाया और अनपढ़ ही रह गया। पिछले दो-तीन दिनों से अलग-अलग रुप धारण कर डबवाली शहर में घूमकर लोगों को हंसाने वाला जोकर इतना भी नहीं कमा पाता की वह अपना गुजारा ठीक से कर सके। आज शुक्रवार को जोकर का रुप धारण कर उसने लोगों को हंसाया, लेकिन स्वयं रोते हुए बताया कि उसके परिवार में पांच बहनें हैं और पूरे परिवार की गुजर-बसर इसी कला के माध्यम से बड़ी मुश्किल से चला पाते हैं। उल्लेखीनय है कि भारत में प्राचीन समय से प्रचलित यह बहरुपिये की कला जिसे कभी राजा-महाराजाओं का संरक्षण भी प्राप्त था अब दम तोड़ रही है। खरैती लाल ने कहा कि जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते गए, वैसे-वैसे यह कला कम होती गई। अब तो इस कला के कद्रदान भी कम ही लोग हैं, जिनकी बदौलत वह इस कला को जीवित रखे हुए हैं।
No comments:
Post a Comment