आरटीआई में भ्रामक व झूठी सूचना देने का मामला,बीईओ व प्रिंसिपल पर लगाया जुर्माना

दोनों शिक्षा अधिकारियों के खाते से 12500 -12500 रुपये काट कर खजाने में जमा करवाने के आदेश
डबवाली न्यूज़ डेस्क (इंदरजीत अधिकारी ) राज्य सूचना आयोग हरियाणा ने एक प्रेरणादायक फैसला सुनाया है।आरटीआई के एक मामले में आवेदक को झूठी व भ्रामक सूचना दिए जाने पर राज्य सूचना आयोग ने कड़ा फैसला सुनाया है। आयोग ने शिक्षा विभाग के दो अधिकारियों के वेतन से साढ़े बारह-साढ़े बारह हजार रुपये काटकर सरकारी खजाने में जमा करवाने के आदेश दिए है। आरटीआई एक्टिविस्ट पवन पारिक एडवोकेट ने 19 जून 2019 को राजकीय मॉडल संस्कृति सीनियर सैकेंडरी स्कूल अनाजमंडी सिरसा के प्राचार्य से स्कूल में स्वीपर-सह-चौकीदार रहे सुरेश कुमार पुत्र गंगाराम के बारे में जानकारी मांगी थी। स्कूल की ओर से आरटीआई में सुरेश कुमार के बतौर स्वीपर-सह-चौकीदार के रूप में कार्यरत होने से ही साफ इंकार कर दिया।आरटीआई में मांगी गई जानकारी आधी-अधूरी दी गई। राज्य जनसूचना अधिकारी-सह-प्रिंसिपल की ओर से झूठी व भ्रामक सूचना दिए जाने पर सूचना आयोग हरियाणा में 5 अगस्त २०१९ को शिकायत की गई। मामला राज्य सूचना आयुक्त भूपेंद्र धर्माणी के पास पहुंचा। इस मामले में आरटीआई एक्टिविस्ट पवन पारिक एडवोकेट द्वारा सुरेश कुमार के राजकीय मॉडल संस्कृति सीनियर सैकेंडरी स्कूल अनाजमंडी सिरसा में कार्यरत रहने के तथ्य प्रस्तुत किए गए। आयोग ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को झूठी व भ्रामक सूचना देने का दोषी पाया। बीईओ बूटाराम की ओर से आयोग में दलील रखी गई कि यह सूचना प्रिंसिपल की ओर से दी गई थी, मगर आयोग बीईओ को भी इसमें दोषी करार दिया। आयोग की ओर से मामले में ११ मई को आर्डर जारी किए गए है, जिसमें बीईओ बूटाराम तथा प्रिंसिपल सहीराम पर 12500 -12500 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। दोनों अधिकारियों के वेतन से यह राशि काटकर सरकारी खजाने में जमा करवाने के आदेश दिए गए है।
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- क्या था मामला
दरअसल, राजकीय मॉडल संस्कृति सीनियर सैकेंडरी स्कूल अनाजमंडी सिरसा में सुरेश कुमार ने कुछ वर्ष तक स्वीपर सह चौकीदार के रूप में कार्य किया। वह अनुबंध पर कार्यरत था। कुछ वर्ष कार्य करने के बाद उसे नौकरी से हटा दिया गया। जब उसने अपने कार्यकाल का हवाला देकर नौकरी के लिए प्रयास करने चाहें, तब स्कूल प्रशासन द्वारा उसके कार्य करने से ही इंकार कर दिया गया। स्कूल से उसका रिकार्ड ही गायब कर दिया गया। जब पीडि़त ने आरटीआई एक्टिविस्ट पवन पारिक से संपर्क किया। तब उन्होंने आरटीआई में जानकारी मांगी। मगर, स्कूल प्रशासन ने कथित जवाबदेही से बचने के लिए भ्रामक जानकारी देकर मामला दबाने की कोशिश की। इस बीच ऐसे तथ्य हाथ आए, जिससे यह साबित होता था कि उसने स्कूल में कार्य किया है। दरअसल, नौकरी के दौरान सुरेश कुमार को किसी अन्य स्कूल में ड्यूटी पर भेजा गया था। इसके साथ ही कार्य अवधि के दौरान उसने झाडू् व अन्य सामान की खरीददारी भी की थी, जिसे सबूत के रूप में प्रस्तुत किया। सूचना आयोग द्वारा जांच में यह साबित हुआ कि शिक्षा विभाग द्वारा दी गई जानकारी झूठी व भ्रामक साबित हुई।
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